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Photo Gallery: जनता की भाषा राजकाज की भाषा बने- डाॅ. आर.एन. सिंह

 

जनता की भाषा राजकाज की भाषा बने- डाॅ. आर.एन. सिंह


Venue : Govt. V.Y.T. PG AUTONOMOUS COLLEGE, DURG
Date : 17/09/2019
 

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जनता की भाषा राजकाज की भाषा बने-
डाॅ. आर.एन. सिंह

देश को आजाद कराने वाली भाषा आज तक राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी है, यह दुख की बात है। हम इसी पीड़ा से मुक्ति के लिए हिन्दी दिवस मनाते है जनता की भाषा राजकाज की भाषा बने इसलिए हिन्दी दिवस मनाते है। यह उद्गार शासकीय वि.या.ता.स्नात.स्वशासी महा. दुर्ग के हिन्दी विभाग द्वारा ष्हिन्दी दिवसष् पर आयोजित कार्यक्रम में प्राचार्य डाॅ. आर.एन. सिंह ने व्यक्त किये। उन्होनें कहा विद्यार्थी अपने मूल विषय पर ज्यादा ध्यान देते हंै, यह स्वभाविक है पर उन्हें भाषा पर भी ध्यान देना चाहिए भाषा पर पकड़ होगी तभी हमारे विद्यार्थी अपने विषय को अच्छी तरह से अभिव्यक्त कर सकेंगे।
प्राध्यापक डाॅ. जयप्रकाश ने हिन्दी भाषा के उद्भव और विकास पर प्रकाश डालते हुए एक जन भाषा का राजभाषा के रूप में स्वीकृत किये जाने के इतिहास को विस्तार से समझाया उन्होंने कहा दक्षिण अफ्रिका से लौटने के बाद गांधी जी सक्रिय रूप से स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ गये उन्होंने अनुभव किया स्वराज्य पाने के लिए भाषा में स्वराज्य पाना आवश्यक है और जब 1918 में इंदौर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन हुआ तब देश की जनता को स्वाधीनता आंदोलन से जोड़ने के लिए स्वाधीनता संग्राम की भाषा की रूप में हिन्दी भाषा को प्रस्तावित किया। उन्होंने इस भाषा को हिन्दुस्तानी नाम दिया व इसके प्राचार-प्रसार के लिए प्रथक प्रयास किये देश भर में अनेक केन्द्र भी बने। लेकिन 1946 में राजभाषा को लेकर जो विचार विमर्श हुआ उसमें हिन्दी भाषा राजभाषा बने इसके लिए सहमति नहीं बनी दक्षिण के द्रविड़ प्रदेशों से इसके विरोध के स्वर उभरे और दक्षिण के जनप्रतिनिधीयों ने भी इसका विरोध किया । बहुलतावादी देश होने के कारण सबका सम्मान करते हुए अंततः हिन्दी भाषा के साथ अंग्रेजी भाषा को राजकाज की भाषा स्वीकार किया गया । इसका  का लाभ स्वार्थ प्रेरित राजनीति नौकरशाही ने उठाया। उन्होंने यह समझ लिया की हर कार्य के नोट हिन्दी में होगें तो इसकी जानकारी आम जनता को होगी तब उनकी अहमियत नहीं रहेगी। इसलिए भाषा आयोग बनने के बाद भी हिन्दी भाषा का आमजन के समझ में आने लायक शब्द नहीं गढ़ने दिया गया और राजनीति एवं प्रशासन सभी क्षेत्रों में अंग्रेजी थोपी गई।
आज का दिन हिन्दी भाषा के लिए आत्माहीनता और अंग्रेजी भाषा के लिए आत्म गौरव का दिन है। यह दुखद है। यह आयोजन हिन्दी भाषा के सम्मान के साथ जन अपेक्षाओं के लिए संधर्ष से सार्थक होगा। चर्चा को आगे बढ़ाते हुए थान सिंह वर्मा ने कहा हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए उसके साहित्य का अध्ययन व अन्य भारतीय भाषाओं का सम्मान आवश्यक है साथ ही ज्ञान विज्ञान के विविध क्षेत्रों में जो नवीन शोध कार्य हो रहे हैं उसे अपनी भाषा में उपलब्ध कराना आवश्यक है। विभागाध्यक्ष डाॅ. अभिनेष सुराना ने अपने उद्बोधन में कहा- हमारे विद्यार्थीयों को भाषा की समझ नहीं है यद्यपि उनकी मातृ भाषा हिन्दी या अन्य उप भाषाऐं है । दरअसल वे इसके प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाते हैं। हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए सहज सरल शब्द गढ़ने की आवश्यकता है जो हमारी हिन्दी भाषा के अनुरूप हो। संगोष्ठी में कु. करूणा रामटेके, शीतल, वंदना नायक, जितेन्द्र साहू, मोहित माईकल तथा वेदप्रकाश साहू ने सारगर्भित विचार रखे कार्यक्रम में विभाग के प्राध्यापक डाॅ. शंकर निषाद, डाॅ. बलजीत कौर डाॅ. रजनीश उमरे, डाॅ. सरिता मिश्र, संस्कृत के विभागाध्यक्ष डाॅ. जनेन्द्र दीवान के अलावा बड़ी संख्या में छात्र/छात्राएं उपस्थित थे । कार्यक्रम को सफल संचालन  डाॅ. रजनीश उमरे ने किया ।
 
 प्रति,
संपादक/ब्यूरो चीफ 
दैनिक .........................दुर्ग 
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