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भाषायी तथा सांस्कृतिक विविधता को बचाए रखने के लिए मातृभाषा आवष्यक है


Venue : Govt. V.Y.T. PG AUTONOMOUS COLLEGE, DURG
Date : 25-02-2020
 

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भाषायी तथा सांस्कृतिक विविधता को बचाए रखने के लिए मातृभाषा आवष्यक है - डाॅ. जय प्रकाष 
मातृभाषा हम सबको प्यारी होती है। जिन्दगी की शुरूवात हम मां की भाषा से ही करते हैं। जब हम दुख में होते हैं तो और अत्याधिक खुषी के क्षणांे में सबसे पहले मां को याद करते हैं। किसी भी विषय को व्यक्त करने के लिए मातृभाषा सबसे अधिक सहायक होती है। उक्त विचार शासकीय विष्वनाथ यादव तामस्कर स्वषासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, दुर्ग में हिन्दी विभाग द्वारा विष्व मातृभाषा दिवस समारोह के उद्घाटन करते हुए महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य डाॅ. एम.के. सिद्दीकी ने व्यक्त किये। 
विभाग के अध्यक्ष डाॅ. अभिनेष सुराना ने विष्व मातृ भाषा दिवस मनाये जाने का इतिहास बताया। उन्होंने बताया कि 1952 में पाकिस्तान द्वारा पूर्वी पाकिस्तान पर उर्दू भाषा थोपे जाने के विरोध में ढाका विष्वविद्यालय में युवाओं का आन्दोलन हुआ। जहां पुलिस के गोली चालन से 4 विद्यार्थी शहीद हुये। उनकी याद में मातृभाषा दिवस मनाये जाने का सिलसिला शुरू हुआ और बंगला भाषी पूर्वी पाकिस्तान 1971 में एक स्वतंत्र देष के रूप में अस्तित्व में आया। उन्हीं को याद करते हुए यूनेस्कों द्वारा 1999 में 21 फरवरी को विष्व मातृभाषा दिवस मनाये जाने का निर्णय लिया गया। 2008 से पूरी दुनिया में औपचारिक तौर पर विष्व मातृ भाषा दिवस मनाया जा रहा है। इस आयोजन के संबंध में आधार वक्तव्य देते हुये डाॅ. जय प्रकाष ने मातृभाषा के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा वैष्वीकरण से विकसित पूंजी, तकनीक तथा बाजार की सम्मिलित शक्तियां हमारी बहुलतावादी संस्कृति को खत्म करना चाहती हैं। वर्तमान फासीवादी उभार से न केवल जैव विविधता खतरे में है, बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति खतरे में है। उन्होंने आगे कहा कि भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ पर बंगला देष ने यह सिध्द कर दिया कि धर्म के आधार पर राष्ट्र नही बन सकता। भाषा और संस्कृति से ही राष्ट्र का निर्माण संभव है। इसीलिए मानवता की रक्षा, राष्ट्रों के बीच परस्पर संवाद तथा सौहार्द्र के लिए मातृभाषा को बचाना आवष्यक है। 
इसी कड़ी में डाॅ. के. पद्मावती ने तेलगू डाॅ. ज्योति धारकर (मराठी) डाॅ. शंकर निषाद (भोजपुरी) डाॅ. तरलोचन कौर (पंजाबी), डाॅ. मीना मान (उड़िया) डाॅ. कृष्णा चटर्जी (बंगला) डाॅ. वेदवती मंडावी (छत्तीसगढ़ी) तथा डाॅ. जनेन्द्र दीवान (संस्कृत) ने अपनी भाषा के श्रेष्ठ साहित्य के चुने हुये अंषों का पाठ कर भाषायी विविधता और उसके सौन्दर्य को उद्घाटित किया। इस अवसर पर विषिष्ट अतिथि छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्यकार श्री दुर्गा प्रसाद पारकर तथा श्री त्रेता चन्द्राकर ने छत्तीसगढ़ी भाषा के विषेषता को बताया। वयोवृध्द प्रसिध्द अभिनेता श्री षिवकुमार दीपक ने ‘छत्तीसगढ़ महतारी‘ 20 सूत्रीय नाटक पर पूरी भाव-भंगिमा के साथ एकल अभिनय प्रस्तुत किया। विष्व मातृभाषा दिवस पर काव्य पाठ का आयोजन किया गया, जिसमें कु. शीतल सेन, कु. दुर्गेष्वरी वर्मा, भूपेष साहू , जितेन्द्र कुमार, प्रतीक्षा तिवारी, जैनब खातून, मनीष जांगड़े, वेद प्रकाष, अमित टण्डन, लेविश कुमार तथा छात्र कुलेष्वर जायसवाल ने हिस्सा लिया। हिन्दी से छत्तीसगढ़ी में अनुवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें अनामिका असाटी प्रथम, करूणा रामटेके द्वितीय, जितेन्द्र कुमार को तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। कार्यक्रम के आरंभ में सरस्वती वंदना के पश्चात् अतिथियों का स्वागत किया गया। कार्यक्रम के अंत में अभिनेता श्री षिवकुमार दीपक जी का विभाग की ओर से शाल एवं श्रीफल भेंटकर सम्मान किया गया। कार्यक्रम में प्राध्यापक डाॅ. बलजीत कौर, डाॅ. सुचित्रा गुप्ता, डाॅ. पूर्णा बोस, डाॅ. मीता चक्रवर्ती, डाॅ. सुचित्रा शर्मा, डाॅ. सुरेखा जैन, डाॅ. सोमाली गुप्ता, डाॅ. आई.एस. चन्द्राकर, डाॅ. रंजना श्रीवास्तव, डाॅ. सुनीता मैथ्यू, डाॅ. विजय लक्ष्मी नायडू, डाॅ. सरिता मिश्रा, कु. प्रियंका यादव एवं श्री अमित मिश्रा के अलावा बड़ी संख्या में महाविद्यालय के विद्यार्थी एवं कर्मचारीगण उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डाॅ. रजनीष उमरे व आभार प्रदर्षन प्रोफेसर थानसिंह वर्मा ने किया। 

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